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सक्ती – चुनाव खत्म, वादे गायब! जैजैपुर की पंचायतों में विकास पर ब्रेक, कमीशनखोरी के आरोपों से मचा हड़कंप

चुनाव के समय गांव-गांव में नेताओं का जमावड़ा, अब विकास कार्यों की स्वीकृति के लिए भटक रहे ग्रामीण बजट की कमी और तकनीकी अड़चनों के नाम पर काम टालने का आरोप, ग्रामीणों ने दी आंदोलन की चेतावनी

सक्ती/जैजैपुर | 
चुनाव के दौरान गांवों की गलियों में विकास के बड़े-बड़े वादे, जनता के बीच नेताओं की मौजूदगी और मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने के दावे खूब सुनाई दिए। लेकिन चुनाव खत्म होते ही तस्वीर बदलती नजर आ रही है। जनपद पंचायत जैजैपुर क्षेत्र की अधिकांश पंचायतों में विकास कार्यों की धीमी रफ्तार और स्वीकृति में देरी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय किए गए वादे अब फाइलों में सिमटकर रह गए हैं और गांवों की समस्याओं पर जिम्मेदारों का ध्यान नहीं जा रहा है।
वादे बड़े-बड़े, लेकिन विकास की फाइलें आगे क्यों नहीं बढ़ रहीं?
ग्रामीणों के मुताबिक, चुनाव प्रचार के दौरान जनप्रतिनिधियों ने गांवों में पक्की सड़क, नाली निर्माण, पेयजल व्यवस्था और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का भरोसा दिलाया था। लोगों को उम्मीद थी कि चुनाव के बाद उनके गांवों की तस्वीर बदलेगी और लंबे समय से लंबित विकास कार्यों को गति मिलेगी।
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि कई जगह आज भी विकास कार्यों की स्वीकृति का इंतजार है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब गांवों में मूलभूत सुविधाओं की जरूरत है, तो विकास कार्यों की फाइलें आखिर आगे क्यों नहीं बढ़ रही हैं?
कमीशनखोरी के आरोप, बिना लेन-देन काम नहीं होने का दावा
क्षेत्र में विकास कार्यों की स्वीकृति को लेकर स्थानीय नागरिकों ने कथित कमीशनखोरी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ पंचायतों में विकास कार्यों की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और कथित कमीशन तंत्र के कारण काम प्रभावित हो रहे हैं।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है। इसके बावजूद ग्रामीणों की शिकायतें व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े करती हैं।
यदि विकास कार्यों की स्वीकृति में किसी प्रकार का अनुचित लेन-देन हो रहा है, तो इसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
कभी बजट की कमी, कभी तकनीकी अड़चनें—आखिर कब होगा समाधान?
ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जब लंबित विकास कार्यों की स्वीकृति के संबंध में जानकारी मांगी जाती है, तो कई बार बजट की कमी अथवा तकनीकी खामियों का हवाला दिया जाता है। ऐसे में लोगों को यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि उनके गांव के प्रस्तावित कार्यों की वास्तविक स्थिति क्या है और उन्हें पूरा होने में कितना समय लगेगा।
ग्रामीणों की मांग है कि प्रत्येक लंबित विकास कार्य की स्थिति सार्वजनिक की जाए। साथ ही, जिन कार्यों में तकनीकी कमी है, उन्हें दूर करने और जिन कार्यों के लिए बजट उपलब्ध है, उनकी स्वीकृति की प्रक्रिया समय-सीमा में पूरी की जाए।
चुनाव में जनता याद, अब जनता की समस्याएं नजरअंदाज?
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के दौरान घर-घर पहुंचकर समर्थन मांगने वाले जनप्रतिनिधियों को अब गांवों की समस्याओं पर भी उतनी ही गंभीरता दिखानी चाहिए। सड़क, नाली, पेयजल और अन्य जरूरी सुविधाएं किसी राजनीतिक दल का चुनावी वादा भर नहीं, बल्कि ग्रामीणों की बुनियादी जरूरतें हैं।
जनता ने जनप्रतिनिधियों को गांवों के विकास की उम्मीद के साथ चुना है। ऐसे में विकास कार्यों में देरी, अस्पष्टता और कथित अनियमितताओं को लेकर जवाबदेही तय होना जरूरी है।
ग्रामीणों की दो टूक—समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन
क्षेत्र के जागरूक नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि लंबित विकास कार्यों की समस्याओं का जल्द समाधान नहीं किया गया और स्वीकृति प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं लाई गई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होंगे।
ग्रामीणों की मांग है कि लंबित प्रस्तावों की समीक्षा की जाए, पात्र विकास कार्यों को नियमानुसार स्वीकृति दी जाए और कथित कमीशनखोरी के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
अब प्रशासन की जवाबदेही की बारी
जैजैपुर क्षेत्र की पंचायतों में विकास कार्यों की स्वीकृति को लेकर उठ रहे सवालों पर अब संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। किन पंचायतों में कितने प्रस्ताव लंबित हैं, देरी के पीछे क्या कारण हैं और स्वीकृति की प्रक्रिया कब तक पूरी होगी—इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
लोकतंत्र में चुनाव के समय किए गए वादों की असली परीक्षा चुनाव के बाद होती है। गांवों का विकास यदि प्राथमिकता है, तो फाइलों की रफ्तार भी जमीन पर दिखाई देनी चाहिए। ग्रामीणों को आश्वासन नहीं, पारदर्शी व्यवस्था और विकास कार्यों का वास्तविक लाभ चाहिए।

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