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सक्ती- 🔥 डुमरपारा जनसुनवाई में फूटा जनआक्रोश: खदान के खिलाफ गरजी जनता, समर्थन-विरोध के बीच बना आंदोलन का मंच 🔥

सक्ती/डुमरपारा: सक्ती जिले के डुमरपारा में प्रस्तावित एमआरएस मिनरल्स की डोलोमाइट खदान को लेकर आयोजित जनसुनवाई उस वक्त उबाल पर पहुंच गई, जब सैकड़ों ग्रामीणों ने एक स्वर में परियोजना का विरोध करते हुए पूरे आयोजन को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। जंगल के बीच आयोजित यह जनसुनवाई पारदर्शिता और प्रशासनिक मंशा—दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर गई।

जनसुनवाई स्थल “हमारी जमीन, हमारा जंगल, हमारी जिंदगी” और “हम बिकने वाले नहीं हैं” जैसे नारों से गूंज उठा। ग्रामीणों ने साफ कहा कि उनके जीवन से जुड़े फैसले उन पर थोपे नहीं जा सकते।


👥 जनसुनवाई में जनप्रतिनिधियों की बड़ी मौजूदगी

इस महत्वपूर्ण जनसुनवाई में क्षेत्र के कई प्रमुख जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे, जिनमें
पूर्व विधायक जैजैपुर केशव चंद्रा,
जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती द्रौपदी किर्तन चंद्रा,
मुख्यमंत्री प्रशंसक फोरम प्रदेश अध्यक्ष जगेश राय,
सक्ती विधायक प्रतिनिधि गुलजार सिंह,
जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष रूप नारायण साहू,
भाजपा मंडल अध्यक्ष अभिषेक शर्मा,
बबलू शर्मा, सहस राम कर्ष,
नगर पंचायत अध्यक्ष नारायण कुर्रे,
सांसद प्रतिनिधि बाराद्वार अमित कालानोरिया,
पूर्व नगर पंचायत उपाध्यक्ष विजय सूर्यवंशी,
नगर पंचायत बाराद्वार के पार्षदगण,
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के रवि सिदार, देवेंद्र महंत एवं उनकी पूरी टीम,
साथ ही आसपास क्षेत्र के सरपंच-पंच और भारी संख्या में ग्रामीण महिला-पुरुष मौजूद रहे।


⚖️ अधिकारियों की चुप्पी और जनता के तीखे सवाल

मंच पर मौजूद अधिकारी उस समय असहज नजर आए जब ग्रामीणों ने पर्यावरणीय प्रभाव, जल स्रोतों के खत्म होने का खतरा, वन्यजीवों पर असर और संभावित विस्थापन जैसे गंभीर सवाल उठाए। इन मुद्दों पर ठोस जवाब नहीं मिलने से लोगों का गुस्सा और भड़क गया।


🚨 ‘सेटिंग’ के आरोप, जनता ने दिखाया एकजुटता

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि खदान के पक्ष में माहौल बनाने के लिए जनता और मीडिया को प्रभावित करने की कोशिश की गई, लेकिन डुमरपारा की जनता ने एकजुट होकर इसे नाकाम कर दिया।


🌳 सागौन कटाई का मामला बना बड़ा मुद्दा

विरोध को और तेज करने वाला मुद्दा सागौन पेड़ों की कथित अवैध कटाई रहा। ग्रामीणों का कहना है कि 209 सागौन पेड़ों की कटाई के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे लोगों में नाराजगी और गहरी हो गई है।


🚔 भारी पुलिस बल पर भी उठे सवाल

जनसुनवाई में भारी पुलिस बल की तैनाती ने भी कई सवाल खड़े किए। ग्रामीणों का मानना है कि यदि प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो इतनी सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता क्यों पड़ी।


⚖️ समर्थन और विरोध—दोनों पक्षों की दलीलें

👉 विरोध में उठी मजबूत आवाजें
कई जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने खदान का विरोध करते हुए कहा कि इससे

  • जल स्तर गिरने का खतरा
  • प्रदूषण में वृद्धि
  • पर्यावरण और वन्यजीवों को नुकसान
  • आम जनजीवन पर गंभीर असर

जैसी समस्याएं सामने आएंगी।

👉 समर्थन में भी दिखा भरोसा
वहीं कुछ लोगों ने खदान के पक्ष में कहा कि इससे

  • स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे
  • ग्रामीणों को काम मिलेगा
  • पलायन की समस्या कम होगी
  • क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी

📢 बड़ी चुनौती के रूप में उभरी जनसुनवाई

डुमरपारा की यह जनसुनवाई अब प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है—जहां एक ओर पर्यावरण संरक्षण और जनजीवन की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता है, वहीं दूसरी ओर रोजगार और विकास की उम्मीदें भी जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि यह मामला अब केवल एक खदान परियोजना नहीं, बल्कि “विकास बनाम संरक्षण” की बड़ी बहस का केंद्र बन गया है।


📌 निष्कर्ष

यह पूरा घटनाक्रम साफ संकेत देता है कि बिना जनता के विश्वास और सहमति के कोई भी विकास परियोजना सफल नहीं हो सकती। डुमरपारा की जनसुनवाई अब एक प्रतीक बन चुकी है—जनअधिकार, पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की लड़ाई का।

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