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सक्ती- नया बाराद्वार में पटवारियों की ‘दोहरी सत्ता’ का संग्राम, किसान-हितग्राही बेहाल

बाराद्वार। प्रशासनिक लापरवाही और आपसी खींचतान का एक अनोखा मामला इन दिनों बाराद्वार हल्का में देखने को मिल रहा है, जहाँ एक ही क्षेत्र पर दो पटवारियों का दावा आम जनता के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। हालात ऐसे हैं कि जमीन से जुड़े जरूरी काम ठप हैं और ग्रामीण दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।


🔴 प्रभार को लेकर टकराव, मामला कोर्ट तक पहुँचा

सूत्रों के अनुसार, पटवारी रमेन्द्र राठौर और यशवंत पाटनवार के बीच हल्का प्रभार को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।

  • रमेन्द्र राठौर का कहना है कि उन्हें नया बाराद्वार में पदस्थ हुए अभी महज 8 महीने ही हुए हैं, ऐसे में उनका तबादला नियमों के विपरीत है।
  • उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि डेढ़ साल में तीसरी बार तबादला किया गया, जो स्थानांतरण नीति का खुला उल्लंघन है।
  • इसी के खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिससे मामला और पेचीदा हो गया है।

सबसे बड़ा विवाद तब सामने आया जब राठौर ने नए पटवारी यशवंत पाटनवार को प्रभार सौंपने से साफ इनकार कर दिया।


⚙️ ऑनलाइन vs ऑफलाइन: दो पटवारी, दो सिस्टम

प्रशासन ने स्थिति संभालने के लिए तकनीकी रास्ता अपनाया—

  • भुइयां पोर्टल का पासवर्ड रिसेट कर यशवंत पाटनवार को ऑनलाइन कार्यभार दे दिया गया।
  • वहीं, रमेन्द्र राठौर अब भी ऑफलाइन काम करते हुए खुद को प्रभारी बता रहे हैं।

स्थिति यह है कि:

  • एक पटवारी तहसील कार्यालय से डिजिटल रिकॉर्ड संभाल रहा है
  • दूसरा राजस्व निरीक्षक कार्यालय में बैठकर कागजी कार्य कर रहा है

यानी एक ही हल्का में ‘डिजिटल पटवारी’ और ‘ऑफलाइन पटवारी’—दोनों की अलग-अलग सत्ता चल रही है।


🚜 सबसे ज्यादा मार किसानों और आम जनता पर

इस खींचतान का सबसे बुरा असर क्षेत्र के किसानों और हितग्राहियों पर पड़ रहा है:

  • खसरा-खतौनी और नामांतरण अटके
  • फसल गिरदावरी और निरीक्षण में देरी
  • बंटवारा और बैंक ऋण के दस्तावेज लंबित
  • सरकारी योजनाओं का लाभ रुक गया

ग्रामीणों में सबसे बड़ी परेशानी यह है कि वे समझ नहीं पा रहे—
👉 आखिर किस पटवारी के पास जाएँ?


⚠️ प्रशासन की साख पर सवाल

इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक तरफ नियमों की अनदेखी के आरोप हैं, तो दूसरी ओर समय पर समाधान न निकल पाने से जनता का भरोसा कमजोर हो रहा है।


🧾 निष्कर्ष: ‘सिस्टम की लड़ाई’ में पिस रही जनता

बाराद्वार का यह मामला अब सिर्फ दो पटवारियों का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक समन्वय की विफलता का उदाहरण बन चुका है।
जब तक कोर्ट या प्रशासन कोई ठोस फैसला नहीं लेता, तब तक इसका खामियाजा आम जनता को ही भुगतना पड़ेगा।

👉 जरूरत है तत्काल हस्तक्षेप और स्पष्ट आदेश की, ताकि व्यवस्था पटरी पर लौट सके और लोगों को राहत मिल सके।

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